20090528

जाग स्वयं में लीन कुलीन

ये समझने का वक्त आ गया है कि हर समाज के केंद्र में इसकी राजनीति होती है. अगर राजनीति घटिया दर्जे की होगी तो सामाजिक हालात के बढ़िया होने की उम्मीद करना बेमानी है.

रोहिंटन मालू को जिस वक्त गोली लगी उस वक्त वे वही कर रहे थे जो उन्हें जिंदगी में सबसे ज्यादा प्रिय था - बढ़िया खाने का लुत्फ उठाना और नये-नये विचार सुझाना. रोहिंटन, ओबेरॉय-ट्राइडेंट के कंधार रेस्टोरेंट में मौजूद उन 17 लोगों में से थे जिन्हें बंदूक की नोक पर सीढ़ियों पर इकट्ठा होने को कहा गया था. ऊपरी तौर पर तो आतंकवादी ये दिखा रहे थे कि वे इन लोगों को बंधक बनाने जा रहे हैं मगर उनका असल इरादा सौदेबाजी का था ही नहीं. उनके एक हाथ में एके-47 थी और दूसरे में मोबाइल फोन. आधुनिकता और मध्यकालीन कट्टरता के इस विरोधाभास का प्रदर्शन करते उन हत्यारों ने अपने आकाओं से पूछा, ‘उड़ा दें?’ सिर्फ मौत के आंकड़ों से सरोकार रखने वाले उनके आका उधर से बोले, ‘उड़ा दो.’


रोहिंटन को सात गोलियां लगीं. और जब उनकी लाश बरामद हुई तो उसकी हालत ऐसी थी कि उन्हें सिर्फ उनकी उंगली में मौजूद अंगूठी से ही पहचाना जा सकता था. 48 साल का ये शख्स अपने पीछे छोड़ गया दो किशोरवय बो और अनगिनत अधूरे सपने. इनमें से कुछ सपने तहलका के लिए भी थे जहां रोहिंटन पिछले दो सालों से बतौर स्ट्रैटेजिक एडवाइजर काम कर रहे थे. वे एक करिश्माई व्यक्तित्व थे और मीडिया मार्केटिंग में उनका करिअर सफलता की कहानियों से मिलकर बना था.

रोहिंटन की मृत्यु में एक गहरी विडंबना भी छिपी है. उनकी मौत की वजह वही रही जिसकी अहमियत उनकी नजर में ज्यादा नहीं थी. हमारे साथ हर बैठक में वे राजनीति को लेकर तहलका के जुनून पर बेहद अचंभे और असमंजस में पड़ जाते थे. उनका मानना था कि उनके या कहें कि हमारे वर्ग के किसी भी व्यक्ति की मुश्किल से ही राजनीति में दिलचस्पी होगी, भला इस काजल की कोठरी का हमारी जिंदगी से क्या वास्ता और अगर होगा भी तो इतना नहीं कि हम इस पर इतना ध्यान दें. हमारे कई सीधे और आड़े-तिरछे तर्कों के बाद रोहिंटन अनमने तरीके से ये तो मान लेते थे कि हम कुछ हद तक सही हो सकते हैं मगर ये मानने को जरा भी तैयार नहीं होते कि ऐसा करना हमारे लिए व्यावसायिक रूप से फायदे का सौदा होगा. उनका तर्क होता था कि हमारे वर्ग के पाठकों की दिलचस्पी उन विषयों में होती है जो उनकी जिंदगी से जुड़ी हुई हैं मसलन, खानपान, फिल्में, क्रिकेट, फैशन, टीवी, स्वास्थ्य वगैरह वगैरह. राजनीति से संबंधित लेख तो उन पाठकों को मजबूरन झेलने पड़ते हैं.

विडंबना देखिए कि आखिर में रोहिंटन और उन जसे सैकड़ों बेगुनाहों की मौत की वजह राजनीति ही रही. वही राजनीति जो इस देश में हर दिन गरीबी, भुखमरी और उपेक्षा से हो रही लाखों मौतों की जड़ में है. अगर मुंबई में मरने वालों में से ज्यादातर उससे ताल्लुक रखने वाले नहीं होते तो देश की ज्यादातर दौलत और सुविधाओं तक पहुंच रखने वाले अभिजात्य वर्ग को इसकी फिक्र तक न होती. मगर मुंबई की घटना पर आज अगर सबसे ज्यादा शोर देश का यही कुलीन वर्ग मचा रहा है तो वजह सिर्फ यही है कि आतंक का ये जानवर आज अचानक अपनी सभी हदें पार कर उन संगमरमरी चारदीवारियों के भीतर घुस आया है जिनमें आज तक ये वर्ग खुद को सुरक्षित महसूस किया करता था. द ताज और द ओबेरॉय जसी जगहों पर इसी कुलीन वर्ग के लोग ठहरते हैं और खाना खाते हैं. वे पूछ रहे हैं. क्या इस देश में अब कोई जगह महफूज नहीं रही?

जिस कड़वी हकीकत से भारत का कुलीन वर्ग पांचसितारा होटलों में नजर आ रहे मलबे के टुकड़ों को देखकर दो-चार हो रहा है उसी कडवे सच को करोड़ों आम भारतीय रोज ङोलने को मजबूर हैं. भुखमरी से मर रहे बच्चे, आत्महत्या कर रहे किसान, शोषण का शिकार हो रहे दलित, सैकड़ों साल पुराने बसेरों से खदेड़े जा रहे आदिवासी, कारखानों के लिए जमीनों से बेदखल हो रहे किसान, अलग-थलग पड़ रहे अल्पसंख्यक..वे जानते हैं कि कुछ ऐसा है जो बहुत गलत हो रहा है. वे जानते हैं कि व्यवस्था काम नहीं करती, ये क्रूर हो गई है, इसमें इंसाफ नहीं मिलता और ये बस उन्हीं के लिए है जो इसे चला रहे हैं. कुलीन वर्ग से ताल्लुक रखने वाले हम लोगों को समझना होगा कि हममें से ज्यादातर इस व्यवस्था से मिले हुए हैं. ज्यादा संभावना यही है कि हमारे पास जितनी ज्यादा सुविधाएं और पैसा है इस अन्यायी व्यवस्था को पनपाने में हमारी भूमिका उतनी ही बड़ी हो.

हम सबके ये समझने का वक्त आ गया है कि हर समाज के केंद्र में इसकी राजनीति होती है. अगर राजनीति घटिया दर्जे की होगी तो सामाजिक हालात के बढ़िया होने की उम्मीद करना बेमानी है. कई दशक से इस देश का अभिजात्य वर्ग देश की राजनीति से हाथ झड़ता रहा है. पीढ़ियां की पीढ़ियां इसे एक गंदी चीज मानते हुए बड़ी हुईं. लोकराजनीति के जरिए आधुनिक भारत के निर्माण का विचाररूपी बीज बोया जाना और उसका खिलना इस महाद्वीप में पिछले एक हजार साल में हुआ सबसे अनूठा और असाधारण प्रयोग था. मगर पिछले 40 सालों में इसकी महत्ता को मिटाने की कोई कसर हमने नहीं रख छोड़ी है. हमारे संदर्भ में ये दोष हमारे मां-बाप का और हमारे बच्चों के संदर्भ में ये दोष हमारा है कि हमने संगठित दूरदृष्टि, संगठित इच्छाशक्ति और संगठित कर्मों की उस विरासत को आगे नहीं बढ़ाया. एक शब्द में कहें तो उस राजनीति को आगे नहीं बढ़ाया जिसने अपने स्वर्णकाल में एक उदार और लोकतांत्रिक देश बनाने का करिश्मा कर दिखाया था. आज रसातल को पहुंची राजनीति से उसी देश के बिखर जाने का खतरा आसन्न है.

इस तरह से देखा जाए तो हम दो तरह से दोषी हैं. एक, उस सामूहिक प्रयास को विस्मृत करने के और दूसरा, जो हो रहा है उसको बिना विरोध किए स्वीकारने के. ऐसा हमारी स्वार्थी वृत्ति और उथली सोच के कारण हुआ है. शाइनिंग इंडिया में हम जैसे साधनसंपन्न लोगों की जिंदगी बेहतर होती जा रही है और हमें लग रहा है कि सब कुछ बढ़िया चल रहा है. हम इस आधे सच में जीकर खुश हैं और बाकी लोगों की मुश्किल जिंदगी को देखना ही नहीं चाहते. दूसरे समाजों के पतन का कारण बने कुलीन वर्ग की तरह हम भी अपनी ऊर्जा का ज्यादातर हिस्सा सोचने-विचारने की बजाय खूब कमाने और उसे उड़ाने पर खर्च कर रहे हैं. हम चटपटी गपबाजियों में वक्त बिता रहे हैं और उन चीजों की तरफ नहीं देख रहे जिनसे हम असहज महसूस करते हैं.

कई सालों से ये साफ दिखाई दे रहा है कि जिस समाज में हम रहते हैं वह भेदभाव, भ्रष्टाचार, कट्टरता, नाइंसाफी जसी बुराइयों के चलते खोखला होता जा रहा है. राजनीतिक नेतृत्व लगातार उन नीतियों पर चलता जा रहा है जो जाति, भाषा, धर्म, वर्ग, समुदाय और क्षेत्र जसी दरारों को चौड़ा कर समाज को बांटती जा रही हैं. दुनिया के सबसे जटिल समाज के अभिजात्य वर्ग के रूप में हम ये देखने में असफल रहे हैं कि हमारे जटिल तानेबाने के कई जोड़ अत्यधिक संवेदनशील हैं. यानी एक गलती हादसों की एक पूरी श्रंखला पैदा कर सकती है. कांग्रेस ने अकालियों की हवा निकालने के लिए जनरैल सिंह भिंडरावाले को पैदा किया, भिंडरावाले ने आतंकवाद को पैदा किया, इंदिरा गांधी ने आतंकवाद के खिलाफ मोर्चा खोला, आतंकवाद ने इंदिरा गांधी की जान ले ली और इंदिरा गांधी की मौत से हुई हिंसा हजारों बेगुनाह सिखों के नरसंहार की वजह बनी. इस एक दशक के दौरान अनगिनत बेगुनाह, उग्रवादी और सुरक्षाकर्मी मारे गए. इसी तरह मंडल की हवा निकालने के लिए भाजपा ने कमंडल का कार्ड खेला, उन्मादी कार सेवकों ने बाबरी मस्जिद गिरा दी, दंगे भड़के, बदला लेने के लिए मुंबई धमाके हुए, दस साल बाद गुजरात में कार सेवकों से भरी एक बोगी जली, अगले कुछ दिनों में राज्य में 2000 मुसलमानों का नरसंहार हुआ, छह साल बाद आज भी इसकी प्रतिक्रिया में हिंसा जारी है.

एक और उदाहरण है. 1940 के दशक की शुरुआत में आजादी की लड़ाई के बीच में अचानक कुलीन मुस्लिम वर्ग एक अलग इस्लामी देश की मांग करने लगा, महात्मा गांधी ने इसका विरोध किया, अंग्रेजों ने इसका समर्थन किया, बंटवारा हुआ, दंगों में दस लाख लोग मारे गए, दो देशों में चार लड़ाइयां हुईं, दोनों की ऊर्जा का बड़ा हिस्सा एक दूसरे के खिलाफ खर्च हुआ, परमाणु हथियारों का जखीरा बना, मुंबई पर हमला हुआ.

इन सभी श्रंखलाओं में एक बात समान है. इनकी शुरुआत कुलीन वर्ग द्वारा लिए गए फैसलों से हुई. अनिगिनत विविधताओं से गुंथकर बना भारत का ताना-बाना बेहद नाजुक और जटिल है. कुलीन वर्ग के लिए ये बहुत अहम है कि वह इस तानेबाने और उसमें अपनी भूमिका को समझे. पूंजी, प्रभाव और सुविधाएं उसके नियंत्रण में हैं. वह इस ताने-बाने की मरम्मत कर सकता है. उसके पास देने के लिए काफी कुछ है और उसे उदारता से देना ही होगा. आम जनता, जिसके पास कुछ भी नहीं है, का गुस्सा और क्षोभ इस तानेबाने को सिर्फ पूरी तरह से ढहा सकता है. और याद रखें कि ज्वालामुखी जब फटता है तो उसमें अमीर और गरीब सभी समान रूप से जल जाते हैं.

सवाल उठता है कि फिर हमें क्या करना चाहिए? नेताओं को गालियां देने को निश्चित रूप से राजनीतिक जागरूकता नहीं कहा जा सकता. और वातानुकूलित जिंदगी जीने वालों की पाकिस्तान पर बम गिराने और टैक्स न भरने की मांग को भी बेतुका ही कहा जाएगा. इस तरह के मूर्खतापूर्ण नाटक को दिखाने की बजाय मीडिया को इसकी उपेक्षा करनी चाहिए. दुनिया में दुश्मनी की पहले ही अति हो चुकी है. हमें इसे शांत करने की जरूरत है न कि भड़काने की. जहां तक पाकिस्तान का सवाल है तो वह तो खुद ही गिरी हुई राजनीति की वजह से बर्बाद है. इसे बमों की बरसात की नहीं बल्कि मदद के हाथ की जरूरत है. याद रखना होगा कि जब संवेदनहीन नौकरशाह गुस्से में अपने दांत पीसते हैं तो इसका शिकार मासूम बच्चों को होना पड़ता है.

पिछले कुछ दिन से हो रहे प्रदर्शन और नारेबाजी सामूहिक तौर पर अपना गुस्सा निकालने से ज्यादा कुछ नहीं. सच पूछिए तो नेता भी वही कर रहे हैं जो हम कर रहे हैं. यानी सिर्फ अपने लिए सोचना, ज्यादा से ज्यादा कमाई करना और देश की बेहतरी के रास्ते में खड़ी चुनौतियों से मुंह मोड़ लेना. बस नेता की पहुंच ज्यादा है तो वह ये काम ज्यादा बेहतर तरीके से कर रहा है.

सबसे पहले हमें सच को ईमानदारी से स्वीकारने की जरूरत है. इस बात को मानने की जरूरत है कि हमने राष्ट्रनिर्माण की प्रक्रिया की गाड़ी पटरी से उतार दी है. पांच करोड़ भारतीयों की समृद्धि से देश विकसित नहीं हो जाएगा, खासकर तब जब 50 करोड़ लोगों के लिए जिंदा रहना ही एक संघर्ष हो. आजादी के 60 साल बाद भी आसानी से कहा जा सकता है कि भारत के राजनीतिक नेतृत्व और कुलीन वर्ग ने देश के वंचितों को बुरी तरह निराश किया है. अगर आप देखने की जहमत उठाएं तो आज का भारत वो जगह है जहां नवजात बो मक्खियों की तरह मरते हैं और जहां समान अवसरों की बात एक क्रूर मृगतृष्णा से ज्यादा कुछ नहीं.

एक बात हमें साफ तौर पर जान लेनी चाहिए. हम पर संकट इसलिए नहीं है क्योंकि ताज में मौत का तांडव हुआ बल्कि इसलिए है कि गुजरात में 2000 मुसलमानों की हत्या के छह साल बाद भी इंसाफ का दूर-दूर तक नामोनिशान नहीं है. गैरबराबरी के बाद ये दूसरी बात है जिसे कुलीन वर्ग को समझना होगा. सभ्यता की शुरुआत से ही हर समाज की बुनियाद इंसाफ का पहिया रहा है. आप सिर्फ उन लोगों के लिए ही मोमबत्तियां कैसे जला सकते हैं जो आपके वर्ग से हों. आपको हर नागरिक के लिए आवाज उठानी होगी.

हमें नए कानूनों की जरूरत नहीं है. जरूरत है तो ऐसे लोगों की जो पहले से ही मौजूद कानूनों पर अमल सुनिश्चित कर सकें. आज हमारी सारी संस्थाएं और प्रक्रियाएं जर्जर हो रही हैं. हमने उन मूल्यों और दूरदृष्टि के साथ ही समझौता कर लिया है जिन्हें ध्यान में रखकर इन संस्थाओं की नींव रखी गई थी. अब हर संकट की घड़ी में क्षत बचाने के लिए हम साहस के चंदेक व्यक्तिगत उदाहरणों पर ज्यादा निर्भर रहते हैं. हमें ये याद रखना होगा कि महान व्यवस्थाएं और समाज ऐसे प्रेरणादायीकार्यों की एक समूची श्रंखला से बनते हैं जिनकी सोच निजी स्वार्थ के परे हो. अपने ऊपर से प्रेरणा पाकर लोग अपना सर्वोत्तम करने का प्रयास करते हैं. चारों तरफ नजर दौड़ाइए. कितने कांस्टेबल, हेड कांस्टेबल, सब इंस्पेक्टर ऐसे होंगे जो उन भ्रष्ट लोगों के लिए अपनी जान दांव पर लगाएंगे जिनकी सेवा में वे तैनात रहते हैं.

काश मुंबई में पिछले हफ्ते बरसे आतंक में रोहिंटन की जान बच जाती. एक पल में वे हमारा पक्ष समझ गए होते. आर्थिक और सामाजिक सुधारों से कहीं ज्यादा जरूरत आज राजनीति में आमूल-चूल बदलाव की है, उस शुचिता की, जिसने देश को आजादी दिलाई. भारत के कुलीन वर्ग को अपने हाथों के गंदे होने का डर छोड़ना होगा. तभी उसे एक साफ-सुथरा देश मिल सकेगा.
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कोई भी मूल्य एवं संस्कृति तब तक जीवित नहीं रह सकती जब तक वह आचरण में नहीं है.

छाया वीर

इतिहास आखिरकार मनमोहन सिंह का फैसला इस आधार पर नहीं करेगा कि वे क्या थे और उन्होंने क्या किया बल्कि ये फैसला इस आधार पर होगा कि उनके जाने के बाद क्या हालात उभरे?

पांच साल का कार्यकाल सफलतापूर्वक पूरा करने के बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का विश्लेषण दूसरे किस तरह कर रहे हैं इससे ज्यादा दिलचस्प ये जानना होगा कि खुद मनमोहन अपना आकलन कैसे करेंगे. मन के दर्पण में झांकने पर उन्हें किस तरह का अक्स नजर आएगा? क्या ये अक्स ऐसे प्रोफेसर और अर्थशास्त्र का होगा जो दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का प्रधानमंत्री बनकर संभावना की हर उड़ान के परे निकल गया या फिर असाधारण नम्रता वाले एक भले आदमी का जो असाधारण नम्रता वाले एक भले नेता में तब्दील हो गया? क्या ये छवि अपने मालिक के आदेश पर जीने और मरने के लिए तैयारे सक्षम सेवक की होगी या फिर चतुराईविहीन अनुयायी के आवरण में छिपे एक चतुर नेता की?

कहा जाता है कि इतिहास सबका निष्पक्ष फैसला करता है. मगर सच ये है कि इतिहास के जरिए भी घटनाओं को समझना कई बार मुश्किल हो जाता है. आखिर कौन कह सकता था कि मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बन जाएंगे और वह भी एक गठबंधन सरकार के. और उससे भी बढ़कर ये कि वे अपना कार्यकाल सफलतापूर्वक पूरा कर जाएंगे.

मनमोहन की सज्जनता और कार्यकुशलता पर दोराय नहीं हो सकती. मगर कितने भी प्रशंसनीय होने पर भी सिर्फ इन गुणों का होना ही काफी नहीं. ये तो कई दूसरे लोगों में भी मिल जाते हैं. एक अरब की आबादी के नेता में लोग इससे कहीं ज्यादा खूबियों मसलन दृष्टि, प्रेरणा, साहस, इच्छाशक्ति, कूटनीति और जनता के मन में झांकने व इतिहास की धारा को बदलने की क्षमता की उम्मीद करते हैं. योजनाओं का कार्यान्वयन अहम गुण है मगर इसके लिए भी व्यवस्था में योग्य लोग मौजूद होते हैं उदाहरण के लिए ब्यूरोक्रेट्स, अर्थशास्त्री आदि.

कुछ लोग दावा करते हैं कि मनमोहन को देखकर उनके बारे में कोई निष्कर्ष बना लेना भूल होगी. उनमें आम भारतीय नेताओं जैसी ठसक और वाकपटुता न होने का मतलब ये नहीं कि वे कमान नहीं साध सकते. बल्कि प्रशंसक तो मानते हैं कि किसी तरह का सतही दिखावा न करना ही मनमोहन को राजनीति के खेल में दूसरों से ज्यादा मंझा हुआ खिलाड़ी साबित करता है. यही वजह है कि वे आज प्रधानमंत्री हैं और वे नहीं जो इस पद के लिए धक्कामुक्की कर रहे थे.

मगर इतिहास की रोशनी में देखने पर मनमोहन के मंझे हुए राजनीतिक होने का ये तर्क लड़खड़ाने लगता है. हर बार ये साफ नजर आता है कि अपनी मर्जी से काम करने की बजाय उन्होंने वही किया जो उनसे करने को कहा गया. नरसिम्हा राव की सरकार में वित्तमंत्री का उनका कार्यकाल इसका उदाहरण है. प्रधानमंत्री के तौर पर भी उन्होंने वही किया जो उनसे पार्टी या सीधे-सीधे कहा जाए तो सोनिया गांधी ने करने को कहा. दिशानिर्देश सोनिया के रहे और पालन करने के तरीके शायद उनके अपने. ये भी हो सकता है कि उनके विचार काफी हद तक सोनिया से मिलते थे मगर फिर उन पर अमल भी इसीलिए हुआ क्योंकि उन्हें मनमोहन के नहीं बल्कि सोनिया के विचारों के तौर पर देखा गया. बड़े फैसले आम सहमति के आधार पर लिए गए मगर अक्सर ऐसे मौकों पर सिंह मार्गदर्शन के लिए सोनिया की तरफ ताकते रहे. शायद एक तरह से ये उनके लिए फायदेमंद ही रहा. मनमोहन की विशेषज्ञता का क्षेत्र राज की बजाय अर्थनीति रहा है इसलिए हो सकता है कि जनता की नब्ज को समझने के मामले में सोनिया की छाया ने उन्हें अमूल्य मार्गदर्शन प्रदान किया हो.

पांच साल के कार्यकाल के बाद अगर मनमोहन का मूल्यांकन किया जाए तो शायद उन्हें एक विशुद्ध नौकरशाह के तौर पर देखा जाएगा जो सिर झुकाए अपना काम करता रहा और अपने लिए तय दायरे से बाहर कभी भी नहीं गया, जिसने कभी किसी के साथ पंगा नहीं लिया और जो हमेशा दिशानिर्देशों का इंतजार करता रहा. एक ऐसा शख्स जिसका सम्मान उसके व्यक्तित्व की नहीं बल्कि उसके पद की वजह से ज्यादा हुआ और जो शायद प्रधानमंत्री न होता तो 100 करोड़ क्या 100 लोगों का भी नेता नहीं हो सकता था.

मनमोहन सिंह के कार्यकाल को कॉरपोरेट जगत और अमीरों के राज के रूप में देखा जाएगा जिसमें आम आदमी का जिक्र दो बार हुआ. पहली बार तब जब सभी पूर्वानुमानों को धता बताते हुए यूपीए सत्ता में आया और उसने अति कृतज्ञता जताते हुए आम आदमी का राग अलापा. और दूसरी बार पिछले नौ महीनों के दौरान, जब उसे ये अहसास हुआ कि अब वापस उसी परेशान मतदाता की देहरी पर जाना है. इसके अलावा प्रधानमंत्री के कार्यकाल का ज्यादातर हिस्सा इस देश के अमीरों को समर्पित रहा. वे अक्सर व्यापारिक घरानों और मीडिया हाउसों के उन आयोजनों में दिखते रहे जिनका कोई खास मकसद नहीं होता था. पैसे की बोली बोलने वालों से मिलने के लिए हमेशा उनके पास वक्त रहा जबकि जनता की भाषा बोलने वालों को जंतर-मंतर पर धरना देकर या 10 जनपथ के आगे लाइन लगाकर संतोष करना पड़ा.

अमीर वर्ग के लिए उनका ये झुकाव अजीब था. ऐसा लगा जैसे उन्होंने उस अहम सबक पर ध्यान नहीं दिया जो भारत के हर नेता को कंठस्थ होना चाहिए. वह सबक ये है कि अपनी हर बात और काम से भारत के प्रधानमंत्री को देश के गरीबों और वंचितों का प्रतिनिधि लगना चाहिए. ये एक ऐसा नियम है जिसका कम से कम तब तक अनिवार्य रूप से पालन होना ही चाहिए जब तक हमारे देश में हर बच्चे को पर्याप्त शिक्षा और भोजन न मिलने लगे या जब तक कुल गरीबों का आंकड़ा गिरकर एक करोड़ तक न आ जाए. रिकार्ड के लिए बता दें आज ये आंकड़ा पचास करोड़ के करीब है.

हालांकि इस विशुद्ध नौकरशाह ने इस देश की असल बीमारियों को दूर करने के मकसद से भी कुछ काम किए मगर तभी जब हाईकमान ने ऐसा करने के लिए कहा. सूचना के अधिकार और राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना इसके उदाहरण हैं. मगर ज्यादातर मौकों पर वे खुद को एक ऐसे नेता के रूप में पेश करने में विफल रहे जो मुश्किलों से जूझ रहे देश के लोगों में उम्मीद पैदा कर सके. नक्सल समस्या पर उनके बयान बुरे सुझाव का नतीजा दिखे, गुजरात पर उनकी खामोशी भयावह रही और किसानों को आत्महत्या करने से रोकने के उनके उपाय बेअसर साबित हुए. और सबसे महत्वपूर्ण पर्यावरण को बचाने के मुद्दे पर तो उनका कार्यकाल शायद विपरीत प्रभावकारी रहा. जनता बनाम पूंजीपतियों की हर लड़ाई में वे जनता के साथ खड़े नहीं दिखे.हां, एक मुद्दे पर उन्होंने जरूर दृढ़ता दिखाई मगर इसने उनकी साख बढ़ाने के बजाय उनकी प्राथमिकताओं और जुड़ाव पर नए सवाल खड़े कर दिए. परमाणु करार के फायदे और नुकसान क्या होंगे ये तो सही मायनों में आने वाला वक्त ही बता सकता है मगर फिलहाल तो इस करार ने मनमोहन की विश्वबैंक और अमेरिका समर्थक छवि को बिल्कुल पक्का कर दिया है.

एक मुद्दा ऐसा भी रहा जिस पर उन्होंने राजनेता जैसे धैर्य का परिचय दिया और इसका श्रेय हमेशा उन्हें दिया जाएगा. पिछले साल 26 नवंबर को मुंबई में हुए हमले के बाद जब मीडिया सहित हर कोई पाकिस्तान के खून का प्यासा हो रहा था तो प्रधानमंत्री संतुलित रहे. उनकी प्रतिक्रिया में किसी अपरिपक्व देश के गुस्से की बजाय एक महान राष्ट्र की दूरदर्शिता दिखी.

यही शांतचित्तता उनकी स्थायी विरासत का एक भाग हो सकती है. उन्होंने कोई आवरण नहीं ओढ़ा और जैसे थे वैसे ही बने रहे. इस तरह उन्होंने शीर्षस्तर पर राजनीति के ओछेपन का स्तर कम किया. इसके लिए हमें उनका शुक्रगुजार होना चाहिए कि अगर उन्होंने सार्वजनिक आचरण के गिरते मानदंडों को अगर उठाया नहीं तो और गिराया भी नहीं.

विडंबना ये है कि इतिहास आखिरकार उनके बारे में फैसला इस आधार पर नहीं करेगा कि वे क्या थे और उन्होंने क्या किया. ये फैसला इस आधार पर होगा कि उनके जाने के बाद क्या परिदृश्य बनता है. अगर हिंदू दक्षिणपंथी ताकतें मजबूत होकर सत्ता में वापसी करती हैं तो उन्हें ऐसे नेता के तौर पर देखा जाएगा जिसने तूफान को रोकने के लिए पर्याप्त कोशिश नहीं की. उधर, राहुल गांधी अगर कांग्रेस में नई जान फूंकने में कामयाब हो गए तो मनमोहन को नेहरू-गांधी खानदान की कहानी में उस फुटनोट के तौर पर देखा जाएगा जिसने एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में सत्ता हस्तांतरण को सुगम बनाया. लेकिन यदि इसके बाद देश और भी ज्यादा अवसरवादी गठबंधनों, संकीर्ण राजनीति और प्रशासकीय अराजकता के दौर में धंसता है तो उन्हें समझदार और संतुलित नेताओं के दौर के आखिरी व्यक्तित्व के रूप में याद किया जाएगा.

एक बार फिर से वही सवाल. अपने मन के आइने में झांकने पर मनमोहन को किस तरह का अक्स नजर आएगा? शायद उन्हें एक ईमानदार और परिश्रमी व्यक्ति का प्रतिविंब दिखेगा जिसने ऐतिहासिक संयोग से मिले हर मौके पर अपनी नम्रता और कृतज्ञता बनाए रखी, जो महान नहीं तो सही मायनों में असाधारण तो रहा ही और जिसमें साहस से ज्यादा सज्जनता और इच्छाशक्ति से ज्यादा इच्छापालन की भावना रही. देखा जाए तो उनका प्रदर्शन ठीक-ठाक रहा. जैसे हालात थे उनमें मनमोहन इतना ही कर सकते थे.

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कोई भी मूल्य एवं संस्कृति तब तक जीवित नहीं रह सकती जब तक वह आचरण में नहीं है.